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युथ सेंटर (यायावर का अनुभव)

        कुछ रिश्ते बनाते- बनाते जहां पूरी ज़िन्दगी निकल जाती है वहीं कुछ रिश्ते बस एक मुस्कुराहट से ही बन जाते हैं। ऐसा ही कुछ प्यारा सा रिश्ता बना मेरा झाँसी से 16 किलोमीटर दूर बसे ओरछा गांव के बच्चो से। यूँ तो ओरछा में कई आकर्षण है पर मुझे जिसने सबसे ज्यादा आकर्षित किया, वह है वहाँ का "युथ सेंटर" और वहाँ के बच्चे। जितने मासूम ये बच्चे हैं उतने ही अनुशासित भी। इस युथ सेंटर की शुरुआत किया --  फ्रेंड्स ऑफ़ ओरछा की आशा डिसूज़ा ने जो अल्मोड़ा, उत्तराखंड की निवासी हैं। जहाँ युथ सेंटर की शुरुआत इन्होंने की, उसे ओरछा के होम स्टे के होस्ट के बच्चे संभालते हैं। आशा डिसूज़ा महीने में एक बार आकर नए नए गेम्स लाकर देती है और बच्चो को सिखाकर भी जाती है। उसके अलावा युथ सेंटर में योगदान रहता है -- होम स्टे में रुके हुए मेहमानों का, जो दुनियाभर से आते हैं और इन्हें कुछ नया सीखा जाते हैं। इस  युथ सेंटर के खुलने का निर्धारित समय है दोपहर के 3 से 4 बजे जिसमें करीब 20 से 25 बच्चों के नाम रजिस्टर्ड हैं। इसे खोलने की जिम्मेदारी किसी टीचर मेंटर या गाइड की नहीं है। इसे तो  युथ सेंटर की ही एक बच्ची खुशी जो 5वीं कक्षा में पढ़ती है,  उसे दी गयी है। गुरुवार जो की छुट्टी का दिन निर्धारित है उस दिन छोड़कर बाकि दिन अपने समय पर ये युथ सेंटर खोल दिया जाता है। ये बच्चे बिना अपनी ख़ुशी दीदी से परमिशन लिए बगैर अंदर नहीं आते, अंदर आते ही गुड आफ्टरनून विश करते हैं। ये हैं सारे हमउम्र ही पर उस एक घंटे के लिए ख़ुशी दीदी उनकी टीचर बन जाती है जिसे वे बिना किसी जबरदस्ती और कोई न देख रहा हो तो भी आदर देना जानते हैं। अंदर आकर बिना कोई शोर किये बच्चे अपने लिए गेम्स सेलेक्ट करते हैं। गेम्स भी ऐसे जो उन्हें कुछ सिखाये जैसे मास्टरमाइंड पजल फिर कुछ देर इंग्लिश सीखते हैं और थोड़े आउटडोर गेम जैसे फोर बॉक्स और हर संडे ड्राइंग। जहाँ उनका अनुशासन, ईमानदारी देखकर मैं अचम्भे में थी, उतनी ही हैरानियत हुई उनकी बाते सुनकर। जब मैंने उनसे उनके सपनों के बारे में पूछा तो जवाब मिले --- पेंटर, नेवी, आर्मी, कलेक्टर और जो मेरा फेवरेट जवाब था मुझे ना पैसे कमाकर अमेरिका अफ्रीका घूमना है दुनिया देखनी है। और, फिर जब बात चली कि स्कूल में पढाई के अलावा आप लोग और किन एक्टिविटीज में भाग लेते हो तो एक जवाब आया मैडम मुझे डांस करना बहुत पसंद  है और इस बार 26 जनवरी को पार्टिसिपेट भी करना था. पर ड्रेस लेने के लिए पापा के पास पैसे नहीं थे तो मैं नहीं कर पाया. इस पर मैं कुछ बोलूँ उसके पहले ख़ुशी और सभी बच्चों ने ही बोलना चालू कर दिया. अरे तो हर बार जरूरी थोड़ी है कि नयी ड्रेस ली जाए, ये  अपने दोस्तों से भी तो ली जा सकती है। मुझे भी "बुमरो बुमरो" डांस में ड्रेस की जरुरत पड़ी थी तब मैंने अपने दीदी से ड्रेस ले लिया था और पैसे हम भी तो बचा सकते हैं, अगर कोई रिश्तेदार या हमारे घर आये  मेहमान पैसे देकर जाते हैं तो जमा करके रखना चाहिये। फिर जब कभी जरुरत पड़े तो उसी में से निकाल सकते हैं। अगर कभी मम्मी पापा को पैसों को लेकर टेंशन हो तो उन्हें भी मदद कर सकते है,बिना यह सोचे कि ये बस हमारे पैसे हैं। मैंने 1300  रूपए जमा कर लिए थे उसमें से 500 रुपए की की मैंने ड्रेस खरीद ली अपने लिए और 800 रुपए अभी भी बचे हुए हैं, तुम भी ऐसे कर सकते हो।  इन बच्चो की समझदारी बस इतनी ही नहीं तो जहाँ आधी दुनिया धर्म के नाम पर लड़ती है वही ये सभी धर्म का आदर भी करना जानते हैं। बाहर खेलते खेलते किसी ने "अल्लाह हु अकबर " बड़ी ही मस्ती में गाना शुरू किया और उसी मस्ती में सारे बच्चे वैसे ही गाने लगे। 2 ही सेकंड हुए होंगे कि सब रुक गए और खुद ही सबने  सॉरी बोल दिया ये कहकर कि "ये किसी के धर्म का गाना है उसका मजाक  नहीं उड़ाना चाहिए अगली बार हम ऐसा नहीं करेंगे ।" खेलने के बाद इनका समय ख़त्म होता है अटेंडेंस के बाद ही     फक्र हो रहा था इन बच्चो से मिलकर। जहां शहर के बच्चो को देखकर हमेशा एक सोच में पढ़ जाती हूँ कि कहाँ खो गया है इनका बचपन, वही उस छोटे से गाँव के कुछ बच्चो को देखकर फिर बच्चा बन जाने की इच्छा जाग उठी। मुझे ख़ुशी हो रही थी यह देखकर कि आज भी ऐसा बचपन कहीं जिन्दा है।  युथ सेंटर पर जाकर मेरी कोशिश चालू थी कि इन्हें कुछ नया सिखाकर जाऊँ। पर हुआ कुछ उल्टा दो दिन के उस एक एक घंटे ने मुझे  ही बहुत कुछ सीखा दिया। उन छोटे बच्चो को देखकर लगा था इन्हें कुछ समझदारी की बाते सिखाकर जाऊँगी पर मेरी समझदारी की बातें जहाँ किताबों से निकालकर आयी होती वही उनकी समझदारी जिंदगी को जीकर आ रही थी। इसीलिए शायद कहते हैं --

घटाओं में निकलो,

धुप में नहाकर देखो  

ज़िन्दगी क्या है,

किताबो को हटाकर देखो  

- निदा फ़ाज़ली  

अगर आप पाठकगण कभी ओरछा जाएँ, तो अपना कुछ इस युथ सेंटर में जरूर समय बिताइए। उन बच्चो के लिए नहीं तो अपने लिए, कुछ नया जरूर सीखकर आएंगे।

 

स्नेहल वानखेडे,

बैंक ऑफ इंडिया,

प्रबंधक (विपणन),

नागपुर

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