निज भाषा उन्नति अहै, सब भाषा को मूल, बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल ।

प्रेम से प्रेम तक

प्रेम हमारी शैली है,

प्रेम ही जीवन-दान ।

कुछ भी कर दें प्रेम-हित,

छोड़ अहम् अभिमान ।।

1 एक प्रेम के कारण ही, जीवन स्वर्ग बना ।

चलता जो यहां प्रेम-पथ, वही केवल अपना ।।

2 झुके जो निज के सामने, बिना कुछ सोच-विचार ।

प्रेम उसी को जानिए, वह यारों का यार ।।

3 प्रेम में रहस्य जो रखे, कुछ छिपाए कुछ बताए ।

कपटी, ढोंगी उसे कहें, धोखेबाज वह कहलाए ।।

4 बहुत दूर का वास हो, मिले हो गए बहु काल ।

एक प्रेम के कारण ही, समीप होते वे हर हाल ।।

5 ज्यों-ज्यों प्रेम में उतरे, अकड़ दूर होती जाय ।

अहम्-भावना रहे नहीं, प्रतिपल प्रेम ही सुहाय ।।

6 उस लोक के वासी हैं, जहां प्रेम की नदियां बहती ।

रहना, खाना प्रेमवश; न भावना बदले की रहती ।।

7 रोम-रोम में मस्ती छाई, अंग-अंग फड़क रहा ।

प्रेम ही इसका कारण है, अनुभूति से यह कहा ।।

8 यहां प्रेम है - वहां प्रेम है, अद्भूत हो अनुभूति ।

जैसे किसी योगी को मिले, योग की परम विभूति ।।

9 प्रेमपरक संपति सुनो, महंगे रत्नों की खान ।

महासुख में डूबे वह, जिसने की पहचान ।।

10 सुनो! वासना ‘प्रेम’ नहीं, स्वार्थ से यह दूर ।

देना ही देना इसमें हो, हो समर्पण भरपूर ।।

11 ‘मैं’ के भवरं में फसे रहे, यह तो प्रेम नहीं ।

‘मैं’ से दूटे प्रेम मिले, यही तथ्य है सही ।।

12 और कुछ भी दे दें प्रभु, बस ईष्र्या मत देना ।

एक दिन यह सब छोड़ना, यह जग काल चबेना ।।

13 ‘विश्वशांति’ बस प्रेम से, अन्य पथ बचा न कोई ।

प्रेम में होना जान ले, समय व्यर्थ गुजार न रोई ।।

14 यदि कोई प्रेम को जान ले, जानो सब कुछ मिला ।

शील, शांति, तृप्ति; धन्यवाद का फूल खिला ।।

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आचार्य शीलक राम

दर्शन विभाग

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय

कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

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